लहरें

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ख्वाबों के समंदर में
तैर रहा हूँ नाव लेकर
हलके से उछलती हुई
मुख पर ठंडी सांस फेंककर

सरल था मेरा सफर
सपने थे नहीं तूफानी
मगर वरुण ने मेरे जीवन में
देखी थी अलग कहानी

काला हुआ आसमान
किस्मत उसका साथी
गरज गरज कर समाज की बोली ने
बंद कर दी थी मेरी वाणी

बिजली के अचानक खड़कने से
हुई रोशन यह गुमसुम दृष्टि
मेरी आँखों के काफी पास, अफसोस
हुई इनकी अंधकार से संधि

इस गंभीर हालत में पुकारता किसका नाम?
सूर के पास थे कृष्ण और शबरी के पास राम

ना समझा मैंने उनका विश्वास
क्षीर सागर भी नन्हा सा डबरा
मेरे विचार थे इनसे पराये
बंद तिजोरी में बंद कमरा

डूब गया मैं अपने सपनों में
तैरने लिए लगता है जोश
कैसे बचता खुद को इन गहराईयों से
जब खुद कई भी न था मुझे होश?

पड़ा हूँ अब, सपनो के नीचे
सांसों के बुलबुलों का कैदी
छुटकारे का इंतज़ार कर रहे है हम
सर पर वज़न भारी है जी

अभिजीत कृष्णन